वैल्थ ऑफ इंडिया एन एनसाइक्लिलोपीडिया ऑफ इंडियाज रॉ मैटिरियल रिर्सोसेज

 

आईएसबीएनः 81-85038-00-7 (सैट)

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        वर्कशॉप ऑन गार्डेन ट्रीज़ प्रोस्पेक्टिंग

        एक्सटैन्शन बुलेटिन ऑन सीग्रास (वैल्थ ऑफ इंडिया रॉ मैटीरियल सिरीज़)

        प्रेसियस मिनरल्स इन एवेरी डे लाइफ

        वैल्थ ऑफ इंडिया के बारे में

        पृष्ठभूमि तथा कवरेज

        प्रकाशित श्रृंखला तथा संस्करण

        प्रथम पूरक श्रृंखला

        द वैल्थ ऑफ इंडिया-ए डिक्सनरी ऑफ इन्फॉर्मेशन रिसोर्स ऑन प्लांट्स,एनिमल्स एंड मिनरल्स

        वैल्थ ऑफ इंडिया - कोटेबल क्वोट्स

        स्टेटस ऑफ वैल्थ ऑफ इंडिया पब्लिकेशन

 

वैल्थ ऑफ इंडिया के बारे में

वैल्थ ऑफ इंडिया भारत के पौधों, जन्तुओं तथा खनिजों के प्राकृतिक पदार्थ स्रोतों का एक विश्वकोश है जो उनकी उत्पति, वितरण, विवरण, संघटन, उपयोगिता तथा व्यापार की विस्तृत जानकारी देता है। यह श्रृंखला जो अपनी प्रमाणिकता के लिए विख्यात है, यत्र-तत्र फैली हुई सूचना स्रोतों की सूचनाओं का सारांश है। प्रत्येक लेख की रूपरेखा एक मोनोग्राफिक प्रस्तुतीकरण है जो सही नामपद्धति, स्थानीय भाषा के नामों से आरम्भ होती है और इसमें संक्षिप्त विवरण, भारत में वितरण के मुख्य क्षेत्र, पोधों की खेती के बारे में अपनाए जाने वाले मापदण्ड, पौधों तथा पशुओं की रोगविज्ञान संबंधी समस्याएं, रासायनिक अवयव, उत्पाद, उपयोगिता, उत्पादन और खपत (खनिजों की) तथा व्यापार आंकड़े दिये जाते हैं।

        अनुसंधानकर्ताओं, उद्यमियों, पादप आधारित उद्येगपतियों तथा नीति निर्माताओं के लिए यह एक सुव्यवस्थित गणक है, जो भारत  के प्राकृतिक पदार्थों पर सूचना प्राप्ति के लिए एक मानक संदर्भ ग्रंथ का कार्य करती है विशेषकर स्वामित्व धाराप्रवाह में पारम्परिक ज्ञान के समागम के वर्तमान ग्लोबल प्रचलन में। नीति-निर्धारक इस सूचना का प्रयोग बायो-पाइरेसी को अथवा जैव विविधता चोरी को रोकने के लिये करते हैं। पिछले दिनों इसने हल्दी पर अमेरिकी पेटेंट मामले में भारत की प्राथमिकता पर दावे के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

 

MVC-188S

पृष्ठभूमि तथा कवरेज

वैल्थ ऑफ इंडिया की शुरुआत काफी समय पहले उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में हुई। इसका आरंभिक बिन्दु जार्ज वॉट (1851-1931) द्वारा तैयार किया गया प्रामाणिक छह खंडों का प्रमाणिक आर्थिक उत्पादों का कोश (Dictionary of Economic Products) इसके 6 खंड सन् 1889-1893 के दौरान प्रकाशित किये गये। जिसके पश्चात् 1896 में एक अनुक्रमाणिका भी प्रकाशित की गई। वॉट ग्लास्मो विश्वविद्यालय के एक मेडिकल स्नातक थे, जो सन् 1873 में भारत आये। यद्यपि वे एक शल्य चिकित्सक के रूप में नियुक्त हुये थे। परन्तु अपनी कर्मठता के चलने के कारण उन्होंने क्षेत्रीय अध्ययन के द्वारा आर्थिक रूप से उपयोगी पौधों का अध्ययन एवं संग्रहण करना जारी रखा। दस वर्ष बाद, वॉट को उसकी अभिरूचि के लिए स्वीकृति प्राप्त हुई और उसे 1883-1893 के दौरान कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में भारतीय आर्थिक महत्व के पौधों की प्रदर्शनी आयोजित करने को कहा गया। उसे प्रेरणा मिली और उसके  बाद वॉट ने अपने जीवन के अगले 25 वर्ष अपने वृहद और चिरस्थायी शब्दकोश को बनाने में व्यतीत कर दिये। इस कार्य के लिए उसने अपनी व्याख्याओं के अतिरिक्त लगभग 180 यूरोपीय तथा भारतीय पत्रकारों की सूचनाओं तथा प्रकाशित सरकारी रिपोर्टों का भी उपयोग किया।

        भारत में ब्रिटिश शासन के आरम्भ से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक ब्रिटिश लोग भारत के कृषि व आर्थिक उत्पादों से विशेष रूप से जुड़े रहे। इस युद्ध ने नवीन वास्तविकताओं से परिचय कराया। ब्रिटिशों को उनके युद्ध प्रयासों में औद्येगिक भारत से सहायता की आवश्यकता थी। यह स्पष्ट हो गया कि युद्ध के समाप्त होने पर भी भारत को आजादी समय आने पर ही मिल पायेगी। आजादी के लिए भारत की तैयारियां पहले ही प्रारम्भ हो चुकी थी अपने स्वयं के देश के शासन में भारतीयों की प्रतिभागिता अब बढ़ती ही जा रही थी। जब वर्ष 1942 में वैज्ञानिक एवं औद्येगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की स्थापना हुई तो बोर्ड द्वारा शुरू किये गये कार्यों में एक कार्य वॉट के शब्दकोश का संशोधन एवं विस्तार करना भी था। इस नये कार्य का नाम द वैल्थ ऑफ इंडिया रखा गया। इस कार्य में वॉट का अनुसरण करके, केवल प्राकृतिक पदार्थों पर न केवल एक श्रृंखला को प्रकाशित करना था, बल्कि नये राष्ट्र के लिये उपयुक्त औद्योगिक उत्पादों पर केन्द्रित श्रृंखला का भी प्रकाशन करना था।

        प्राकृतिक पदार्थों के A से Z तक के अक्षर गयारह खंडों में (दो अनुपूरकों सहित) समाहित थे जबकि औद्येगिक पदार्थों की समानांतर श्रृंखला में नौ भाग थे। सभी खंड सन् 1948-1976 के दौरान प्रकाशित किये गये। जब सन् 1948 में प्राकृतिक पदार्थो पर पहला खंड प्रकाशित हुआ इसका प्राक्कथन दो शब्द तो आशानुकूल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री तथा विज्ञान द्रष्टा श्री जवाहर लाल नेहरू के द्वारा लिखा गया। उन्होंने लिखा कि इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह पुस्तक नये भारत के निर्माताओं के लिए बहुमूल्य सिद्ध होगी। यह पुस्तक एक आम आदमी को साक्षर बनाने में भी उतनी ही उपयोगी होगी जिन्हें इस मनोरम भूमि तथा इसकी असीम क्षमताओं में रुचि लेनी चाहिए। यह श्रृंखला न केवल भारत में अपितु और भी कई जगह इतनी रुचि जाग्रत करेगी, ऐसा पूर्वानुमान तो पंडित नेहरू भी न लगा सके थे। जेसे ही यह पता चला कि यह भारत की प्राकृतिक सम्पदा है जिसने औद्योगिक सम्पदा की अपेक्षा विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। हाल ही के कुछ वर्षों से भारत की प्राकृतिक सम्पदा में अभिरुचि पर्याप्त ढंग से बढ़ी है क्योंकि विश्वभर में पारम्परिक ज्ञान पद्धतियों को स्वामित्व की धारा में समाविष्ट करने के प्रयास जोरों से चल रहे हैं।

        मूल प्राकृतिक सामग्री श्रृंखला के पुनरीक्षण तथा विस्तारीकरण के लिए यह कार्य आरम्भ किया गया है। इसमें विद्यमान प्रविष्टियां का अद्यतन करके तथा अन्य नये पौधों को भी इससे शामिल किया गया है। वर्ष 1985-1992 के दौरान पुनरीक्षित श्रृंखला के तीन खंड (एक पूरक भी) भी प्रकाशित किये गये। इन शीर्षकों के अन्तर्गत (Ai-Ci) अक्षरों तक की प्रविष्टियां समाहित हैं। इस स्तर पर इस डेटाबेस को विस्तारित करने के प्रत्येक अवसर पर लाभ उठाते हुए इसे डिजीटलीकृत करने का निर्णय लिया गया। वर्ष 1996-1997 के दौरान इंटरनेशनल डवलपमैंट रिसर्च सेंटर, कनाडा द्वारा निधिबद्ध कार्यक्रम के अन्तर्गत तीन सीडी-रोम बनाये गये।

        प्राकृतिक पदार्थों पर अभी तक 1948-1992 के मुद्रित सभी खंडों को डिस्क डी 2.1 में डाला गया जबकि अद्यतन सूचना को डी 2.2 तथा डी 2.3 में समाविष्ट किया गया1 यद्यपि सीडी पुस्तक का विकल्प नहीं हैं। तदनुसार, सीडी अद्यतनीकरण के लिए एकत्रित सभी सूचनाओं को औचित्यपूर्ण ढंग से संबंधित लेखों में उपयुक्त जांच तथा मानकीकरण के पश्चात् समाहित करके वैल्थ ऑफ इंडिया रॉ मैटिरयल श्रृंखला के पूरक खण्डों में मुद्रित किया गया है।

 

प्रकाशित श्रृंखला तथा खंड

क. वैल्थ ऑफ इंडिया प्राकृतिक पदार्थ श्रृंखला

 

खंड

प्रकाशन वर्ष

मुख्य सम्पादक/निदेशक

मूल् श्रृंखला

I (ए-बी)

1948

बी.एल. मंजुनाथ

II (सी)

1950

बी. एन. शास्त्री

III (डी-ई)

1952

बी. एन. शास्त्री

IV (एफ-जी)

1956

बी. एन. शास्त्री

मत्स्य और मत्स्यिकी अनुपूरक खंड-खंड IV

1962

बी. एन. शास्त्री

V (एच-के)

1959

बी. एन. शास्त्री

खंड VI के अनुपूरक, पशुधन (कुक्कुट पालन सहित)

1970

ए. कृष्णमूर्ति

VII (एन-पीई)

1966

एस.बी. देशप्रमु

VIII (पीएच-आरई)

1969

ए. कृष्णमूर्ति

IX (आरएच-एसओ)

1972

वाई.आर. चड्ढा

X (एसपी-डब्ल्यू)

1976

वाई.आर. चड्ढा

XI (एक्स-जेड) संशोधित श्रृंखला

1976

वाई.आर. चड्ढा

I (ए)

1985

वाई.आर. चड्ढा

II (बी)

1988

एस.पी. एमबस्ता

 खंड II के लिए संक्षिप्त पूरक

1990

जी.पी. फोंडके

II (सीए-सीआई)

1992

जी.पी. फोंडके

 

ख. वैल्थ ऑफ औद्येगिक उत्पाद श्रृंखला

 

खंड

प्रकाशन वर्ष

मुख्य सम्पादक/निदेशक

I (ए-बी)

1948

बी.एल. मंजुनाथ

II (सी)

1951

बी. एन. शास्त्री

III (डी-ई)

1953

बी. एन. शास्त्री

IV  (एफ-एच)

1957

बी. एन. शास्त्री

V (आई-एल)

1960

बी. एन. शास्त्री

VI (एम-पीआई)

1965

बी. एन. देशप्रमु

VII (पीएल-एसएच)

1971

ए. कृष्णमूर्ति

VIII (एसआई-टीआई)

1973

वाई.आर. चड्ढा

IX (जेड तक) भाग I-IX तक की विवरणिका सम्मिलित

1976

वाई.आर. चड्ढा

 

वैल्थ ऑफ इंडिया प्रथम पूरक श्रृंखला

        प्रथम पूरक श्रृंखला में 8 वष्र की अद्यतनीकरण अवधि (1987-94) के लिए लगभग A से Z तक के  पौधों, जन्तुओं तथा खनिजों की लगभग  5000 प्रविष्टियों में सूचना की समाविष्टि के लिए पर्याप्त ज्ञान का भण्डार है। इसे अपनी मूल श्रृंखला वाले फॉर्मेट में पांच खंडों में प्रकाशित किया गया है तथा इसे मूल खंडों के स्वरूप जैसा प्रस्तुतीकरण देने का हरसंभव प्रयास किया गया है। हर्बल तथा चिकित्सा के लिये वैकल्पिक पादप आधारित औषधि प्रणालियों की प्रवृत्ति को देखते हुये वर्तमान विश्व में इस श्रृंखला के प्रकाशन में पर्याप्त संभावनाएं दिखाई देती है। इस डेटाबेस का पादप आधारित लघु उद्योगों के द्वारा इसकी प्रमाणिकता,  सटीकता तथा ठोस जानकारी के लिए तत्काल संदर्भ के रूप में प्रयोग किया जाता है।

 

प्रकाशित खंड तथा वर्तमान स्थिति

खंड 1 (A-Ci)

प्रथम खंड A-Ci तक प्राकृतिक पदार्थ स्रोतों पर अद्यतन सूचना देता है जिसमें पादपों पर 600 प्रविष्टियां, जन्तुओं पर 4 तथा खनिजों पर 16 प्रविष्टियां हैं। अरैकिस आर्टीमीज़िया, बाक्साइट, मधुमक्खी, ब्रैसिका, ब्लिडिंग स्टोन्स, ऊंट केमेलिया कैथारेंथस, सिट्रस तथा सिवेट पर विस्तृत विवरण के लेख हैं।

इस सूचना के कवरेज में पारम्परिक औषधि प्रणाली पर विशेष प्रभाव डालने के साथ-साथ बॉयोटेक्नोलॉजी में जैविक अनुसंधान की सम्पूर्ण बदलती प्रवृत्तियां  एथनोबॉटनी मानवजाति वनस्पति विज्ञान तथा अपमिश्रित फाइटोकैमिस्ट्री पादप रसायन विज्ञान की स्पष्ट झलक प्रतिबिम्बित होती है। यत्र तत्र उपलब्ध सांख्यिक आकड़ों को सारणी रूप में प्रस्तुत किया जाता है। संदर्भों के लिए एक सामान्य अनुक्रमणिका भी दी गई है। इस खंड में पुस्तकों तथा संदर्भ ग्रंथों की सूची उपलब्ध करायी गई है।

 

(2000; Rupee720)

खंड 2 (Cl-Cy)

खंड 2 (Cl-Cy) के मध्य 260 पौधों, 3 जन्तुओं तथा 2 खनिजों के विषय में अद्यतन सूचना समाहित हें। इस खंड के मुख्य गुण क्लेवीसेप्स, क्ले (चीनी मिट्टी), कोरल, करक्यूमा, सायमॉप्सिम आदि पर सर्वांगपूर्ण, पूर्णतः संशोधित मोनोग्राफिक लेख हैं। सूचना के सार को क्षेत्र, उत्पादन खेती तथा व्यापार के सांख्यिक आंकड़ों तथा प्रमुख किस्मों को सारणी में दिया जाता है। पूरक श्रृंख्ला के शेष बचे लेखों की अद्यतनीकृत अवधि 1987 से 1984 से संबंधित है। विस्तृत विवरण वाले अन्य लेखों में कोकोस, कॉफिया, केकड़ा, मगरमच्छ तथा सिम्बोपोगॉन के अतिरिक्त भविष्य में और अधिक महत्ता वाले लेख शामिल हैं।

 

(2001; Rupee720)

खंड 3 (D-I)

खंड 3 में अक्षर D से I में आने वाले 550 उपयोगी पौधों, 21 जन्तुओं तथा 7 खनिजों पर लेखों का अद्यतनीकरण प्रस्तुत किया गया है। पौधों में डाइरा, एलेइस, यूकैलिप्टस, फाइकस, ग्लाइसीन, गॉसिपियम, हीविया, हॉर्डियम आदि पर जन्तुओं में कुत्ते तथा भेड़िये, केंचुए और हाथी तथा खनिजों मं जिप्सम आदि को प्रमुख स्थान दिया गया है। इसके अतिरिक्त इसके अग्रज खंडों की भांति इसमें परस्पर संदर्भ, खंड में उद्धृत पुस्तकों तथा पुस्तकों तथा अनुसंधान पद्धिकाओं की सूची तथा संबंधित पौधे के पर्यायवाची बताने वाली सामान्य अनुक्रमणिका, अंग्रेजी तथा स्थानीय नाम, औषधि, उत्पाद, सक्रिय यौगिक इत्यादि को भी सूचना की सुलभता के लिए शामिल किया गया है।

(2002; Rupee425)

 

खंड 4 (J-Q)

प्रथम पूरक श्रृंखला की चौथी तथा उपान्तिम श्रृंखला J से Q अक्षर के मध्य आने वाली प्रविष्टियों का अद्यतनीकृत रूप प्रस्तुत करती है। इस खंड में 611 पौधों की प्रविष्टियां जैस्मिनक, लाइकोपर्सिकन, मैंथा, निकोटियाना, ओराइजा तथा प्रूनस निहित हैं। इस खंड में जन्तुओं से संबंधित 16 प्रविष्टियों के साथ मोलस्क, ओइस्टर्स, पोरपोइस तथा डॉल्फिन झींगा, श्रिम्प तथा लोबस्टर्स के विस्तृत वर्णन के कारण यह खण्ड एक्वाकल्चर विशेष खण्ड के रूप में उभरकर आया है। इस खंड में खनिजों की 7 प्रविष्टियों में लिथियम खनिज, मॉली डेनम अयस्क तथा प्लेटिनम खनिजों का वर्णन भी विस्तारपूर्वक किया गया है। इसके अतिरिक्त इसके अग्रज खंडों की भांति इसमें परस्पर संदर्भ, खंड में उद्धृत पुस्तकों तथा अनुसंधान पत्रिकाओं की सूची तथा संबंधित पौधे के पर्यायवाची बताने वाली सामान्य अनुक्रमणिका, अंग्रेजी तथा स्थानीय नाम, औषधि, उत्पाद, सक्रिय यौगिक इत्यादि को भी सूचना की सुलभता के लिए शामिल किया गया है।

(2003; Rupee400)

खंड 5 (R-Z)

प्रथम पूरक श्रृंखला के पांचवें तथा अतिम खंड में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-

पौधे सोलेनम, टर्मिनेलिया, विग्ना, जिआ, जिंजीबर

जीव-जन्तु सिल्क वार्म्स,

स्टारफिश, टॉटॉइजेस तथा टर्टल्स, वीज़ल्स

खनिज साल्ट, स्टीएटाइट  तथा टैल्क, वर्मीक्यूलाइट, जिस्कोनियम खनिज

 

(2004; Rupee720)

संपादकः श्री आर एस जयासोमू, somu@niscair.res.in